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October 28, 2026

Suryoday Samvaad

Nayi Soch Nayi Disha

Chandil : खंडहर बन चुके घर में दो मासूमों संग जिंदगी काट रही विधवा रेणुका : क्या चांडिल प्रशासन की नजर अब भी नहीं पड़ेगी ?

. बिष्णु पद महापात्र 📲 9471102055 (wa)

चांडिल (सरायकेला-खरसावां): 14 फरवरी, 2026 ;
चांडिल प्रखंड अंतर्गत रुचाप पंचायत के ग्राम गांगोडीह में रहने वाली एक असहाय विधवा की दर्दनाक कहानी सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। गांव की निवासी रेणुका मुंडायन, पति स्वर्गीय सोमचांद सिंह मुंडा, अपने दो नाबालिग पुत्रों—12 वर्षीय सुनील सिंह मुंडा और 10 वर्षीय बलराम सिंह मुंडा—के साथ एक जर्जर, मिट्टी की दीवार और खपरैल छावनी वाले खंडहरनुमा घर में रहने को मजबूर हैं।

रेणुका का घर अब घर नहीं, बल्कि किसी भी क्षण ढह जाने को तैयार एक खतरनाक ढांचा बन चुका है। मिट्टी की दीवारें दरक चुकी हैं, छप्पर कई जगह से टूटा हुआ है और उसे लकड़ी व बांस की बल्लियों के सहारे किसी तरह टिकाकर रखा गया है। हर रात रेणुका इसी भय में जागती रहती हैं कि न जाने कब यह जर्जर छत उनके और उनके मासूम बच्चों के ऊपर गिर पड़े।

पति के निधन को तीन वर्ष बीत चुके हैं। परिवार में आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं है। गुजारे के लिए रेणुका को दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ती है, वह भी नियमित रूप से काम मिलना संभव नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप परिवार लगातार गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है। बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की चिंता में वह कई बार गांव छोड़कर दूर शहर में मजदूरी करने का मन बना चुकी हैं, ताकि किसी तरह अपने बच्चों को शिक्षित कर सकें।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि पति के निधन के इतने समय बाद भी इस गरीब विधवा को सरकार की किसी भी आवासीय योजना—यहां तक कि “अबुआ आवास” जैसी योजनाओं—का लाभ नहीं मिल पाया है। न ही किसी स्तर पर उन्हें समुचित मार्गदर्शन या सहायता मिली। यह स्थिति प्रशासनिक उदासीनता और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता को उजागर करती है।

रेणुका की दयनीय स्थिति की जानकारी मिलते ही पीएलवी कार्तिक गोप उनके घर पहुंचे। हालात देखकर वे भी स्तब्ध रह गए। उन्होंने तत्काल परिवार को विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़ने की पहल करते हुए दोनों बच्चों के जाति प्रमाण पत्र, आवासीय प्रमाण पत्र तथा विधवा के नाम से आय एवं पारिवारिक प्रमाण पत्र बनवाने की प्रक्रिया शुरू कराई। साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि जर्जर छप्पर से खपरा हटाकर अस्थायी रूप से एस्बेस्टस शीट लगाने का खर्च स्वयं वहन करेंगे, ताकि परिवार को तत्काल राहत मिल सके।

गंभीर सवाल यह है कि जब गांव में ऐसी हृदयविदारक स्थिति मौजूद है, तो क्या स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी नहीं बनती ? क्या एक असहाय विधवा और उसके मासूम बच्चों को सुरक्षित आवास, पेंशन और अन्य मूलभूत सुविधाएं दिलाना शासन-प्रशासन का दायित्व नहीं है ?

अब देखना यह है कि चांडिल प्रखंड कार्यालय और संबंधित अधिकारी इस मार्मिक पुकार पर कितनी शीघ्र संज्ञान लेते हैं। कहीं ऐसा न हो कि किसी अनहोनी के बाद ही व्यवस्था की नींद टूटे।

गांगोडीह की यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उन तमाम जरूरतमंद परिवारों की है, जो योजनाओं के कागजों में तो दर्ज हैं, पर जमीनी हकीकत में अब भी उपेक्षित हैं। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के लिए यह आत्ममंथन का समय है।

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